।।कातिया समाज गौरव गान ।।
इस जम्बूदीप के कड़- कड़ में हमारा प्रवास है,
काठियावाड़ी वीर हमारा बहुत बड़ा इतिहास है ।
स्वराज शब्द के नारे को बुलंद कराया हमने ही,
स्वदेशी अपनाओ का स्वप्न पूर्ण कराया हमने ही।।
महात्मा गांधी का चरखा भी,हमारे अस्तित्व का प्रतीक है
आशाओं का अंबार दिया, ये वही प्रज्वलित द्वीप है ।
देश दुनियां में अनादिकाल से ही,
हमारे कृत्यों का वर्चस्व रहा ।
कर्म प्रधान जब समाज व्यवस्था,
कातिया जाति का उत्कर्ष रहा ।
इतिहास हमारा सबसे गहरा जबसे,
सिंधुघाटी सभ्यता का अस्तित्व रहा ।
वैदिक युग में भी हम सबका,
औद्योगिकी में स्वामित्व रहा ।
मध्यकाल में अखंड भारत को,
शाश्वत कराया हमने ही ।
पोरस का युद्ध में साथ देकर,
सिकंदर को धूल चटाया हमने ही ।
अंतराष्ट्रीय व्यापार बढ़ाने की सोच लेकर,
हमने ही सिल्क रूट काबिज़ किया ।
चीन ज़िया से लेकर माया तक,
मिस्त्र और मेसोपोटामिया से व्यापार किया ।
खाड़ी देशों में भी हमने खूब नाम कमाया था,
सफेद सोना उन्हें बेचकर असली सोना लाया था ।
यूरोप पश्चिमी सभ्यता भी हमसे ही आकर्षित हुए,
देख हमारी बरकत को ये भी बहुत लाभान्वित हुए ।
पुर्तगाली डच डेन फ्रांसीसी और ब्रिटिश भी कुंठित हुए,
अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी से अपने स्वामित्व से वंचित हुए ।
कभी हाथों में चरखा तो कभी
कभी धारण हाथियार लिया,
कभी धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाई,
कभी तलवारों से वार किया ।
कभी रक्षा की अपनो की,
कभी दुश्मनों का संहार किया ।
पूर्व से लेकर पश्चिम तक हम भूस्वामी रहे ,
हिंद महासागर में व्यापारिक एकाधिकार किया ।
रोटी कपड़ा और मकान के लिए,
सबसे पहले हमने ही संघर्ष किया।
बसुंधरा की आबरू बचाई,
हमने वस्त्रों से ढक दिया ।
कारण जानो इतिहास दौड़ में,
फिर इतना क्यों हम पिछड़ गए
दुनियां को जोड़ा जिस धागे से,
उस सूत के तिनके से हम बिखर गए ।
कभी विदेशी आक्रांताओ,
कभी अपने हमपर हावी हुए,
हमें इतना समृद्ध देख ।
कई ललचाए कई बाघी हुए।
पहले सब ने लाभ कमाया और खूब पीठ थपथपाया था,
बाद उन्हीं गोरों ने धोखे से खंजर घुसाया था ।
यूरोप में हुई औद्योगिक क्रांति कपड़ा मशीन में बनने लगा,
चरखा लिए हम व्यापारियों का नील का खेत भी डिगने लगा।
ना राजनीति में सक्रिय हुए ना कूटनीति समझ आई,
शांतिप्रिय होने के कारण अपनी ही बुनियाद डगमगाई।
आपसी फूट के चलते फायदा
हमारे दुश्मनों ने खूब उठाया था,
उसी धरा से बेदखल कर दिया
जहां उन शरणार्थियों बसाया था ।
अपनी इस पावन बसुंधरा के लिए ,
रण में आज भी सक्रिय हैं।
कातिया हम काठियावाड़ हमारा,
हम काठियावाड़ी क्षत्रिय हैं ।
चुन- चुन के पिरोया धागे में,
और ये वतन सा जुड़ता चला गया ।
सूत कातना व्यापार हमारा,
हमसे ही एशिया को जाना गया।
भारतवर्ष को दुनियां में,
सम्मान दिलाया हमने ही।
सफेद सोना बेच बेचकर,
सोने की चिड़िया बनाया हमनें ही ।
जय हिंद जय भारत
जय कातिया समाज
यशवंत नागेश✍️
त्याग और समर्पण

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